11 दिसम्बर 2025 को यूनाइटेड किंगडम, अमरीका, जापान, साउथ कोरिया, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल ने पैक्स सिलिका परियोजना शुरू की। ये सात संस्थापक देश कहे गये। 12 जनवरी से 31 जुलाई 2026 तक भारत, यूरोपीय संघ, जर्मनी, इटली और यूनान सहित इसमें कई और देश शामिल हुए। अब तक इसमें कुल 25 देश शामिल हैं। इन्हें हस्ताक्षरकर्ता देश कहा गया। 35 देश ‘फ्रेमवर्क देश’ के रूप में शामिल हुए हैं। यह पहल सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है। शायद ही कोई ऐसा मसला होगा जो इसके दायरे से बाहर हो। वास्तव में यह अमरीका के लिए सेमीकण्डक्टर, ऊर्जा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेण्टर बनाने, सस्ता मजदूर उपलब्ध करने, हथियार बनाने और बेचने, खनिज सम्पदा पर कब्जा, आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभुत्व, तकनीकी उत्पाद को बेचने जैसे तमाम हितों को पूरा करेगा। यह राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, भूराजनीतिक, सामरिक के साथ–साथ पर्यावरण को भी प्रभावित करेगा। यह शामिल देश की सम्प्रभुता को खण्डित करेगा। यह दुनिया के ‘सप्लाई चेन’ को अमरीकी नियंत्रत में लाने का प्रयास है। इसकी मदद से अमरीका दुनिया के खनिज पर अपना कब्जा करेगा, जैसे अभी तक तेल के मामले में करता रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी खेमे के राजनीतिक–आर्थिक हितों को साधना ही इसका मुख्य उद्देश्य है।

पैक्स एक लातिन शब्द है जिसका अर्थ शान्ति है। सिलिका प्रतीक है सिलिकॉन से जुड़े तकनीकी उत्पादों के लिए। यानी नाम में शान्ति और तकनीक का मेल है। मतलब सिलिकॉन से जुड़े मसलों पर शान्ति प्रदान करना। लेकिन सवाल यह है कि यह शान्ति किसके लिए है और किस कीमत पर?

पैक्स सिलिका पहल का ढाँचा निश्चित नहीं है। मतलब यह एक अपेक्षाकृत लचीली व्यवस्था है। घोषित पद और पदाधिकारी भी नहीं हैं। स्पष्ट संविधान और जवाबदेही की व्यवस्था नहीं है। इसमें देशों को शामिल करने के तरह–तरह के प्रावधान हैं। जैसे–– हस्ताक्षर देश, फ्रेमवर्क देश, आदि। इन सबमें अमरीका ‘फैसिलिटेटर’ की भूमिका में होगा। मतलब अमरीका ही मुद्दे तय करने, मीटिंग बुलाने, कार्यक्रम तय करने, शामिल देशों की नीति तय करने, आदि की जिम्मेदारी निभायेगा। जाहिर है कि यहाँ लोकतन्त्र नहीं, बल्कि अमरीकी चैधराहट होगी। शामिल देशों को फैसले मानने होंगे। चाहे उसके लिए उन्हें अपने देश में मजदूरों का शोषण–उत्पीड़न, पर्यावरण का विनाश और प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन को आसान बनाने वाले कानून ही क्यों न बनाने पड़े। अमरीकी फतवा जारी होने के बाद शामिल देशों की अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं होगी, सम्प्रभुता का कोई सम्मान नहीं होगा। यह दुनिया के किसी भी संस्था के प्रति जवाबदेह नहीं होगा। मतलब बेलगाम साण्ड की तरह जितना चाहे चरे या बर्बाद करे।

पिछले दशक में चीन, ताईवान और अन्य देश सेमीकण्डक्टर के मुख्य निर्माता के रूप में आये। आपूर्ति श्रृंखला कई देशों पर निर्भर है। जिसमें उनकी अपनी पहलकदमी और अपनी शर्तें भी हैं। अलग–अलग मामलों में विभिन्न देशों की भूमिका भी अलग है। जैसे– अल्गोरिथम के मामले में चीन ने अमरीका को कई बार पटखनी दी। इससे अमरीकी तकनीकी चैधराहट को चुनौती मिली और पैसे लेकर सुविधा देने वाले उसके मॉडल को भी धक्का लगा। यह तभी सम्भव है जब चीन के पास हार्डवेयर के साथ–साथ बेहतर अल्गोरिथम हो। जिससे अमरीका को तथाकथित आर्थिक नुकसान उठाना पड़े। जैसे– अमरीकी एआई ‘चैट जीपीटी’ से बेहतर और सस्ता ‘डीप सीक’। जहाँ अमरीकी मॉडल अपने कोड को छुपाते हैं, तकनीकी उत्पाद और सुविधाओं को महँगे बेचते हैं, वहीं चीनी कम्पनियाँ अपने कोड को ‘ओपन सोर्स’ और सस्ते दामों पर उपलब्ध करा रही हैं। अलग–अलग देशों के पास उत्पादन, डिजाइन, मशीनरी, सॉफ्टवेयर, खनिज और मानव संसाधन के अलग–अलग हिस्से हैं। इससे यह स्पष्ट है कि अमरीकी एकाधिकारी आर्थिक हित अब सुरक्षित नहीं है, दूसरे खिलाड़ी भी मैदान में हैं। यही बहुकेन्द्रीयता अमरीकी तकनीकी एकाधिकार के लिए चुनौती बन रही है।

चीन अपने बड़े–बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अफ्रीका, लैटिन अमरीका और एशिया के देशों में लगा रहा है। बेल्ट एण्ड रोड योजना को आगे बढ़ा रहा है। बड़े–बड़े बैंकों के जरिये कर्ज भी मुहैय्या करवा रहा है। उत्पादन के केन्द्र के रूप में काम कर रहा है। साथ ही ‘ब्रिक्स’, ‘शंघाई को–ऑपरेशन’, ‘एसिआन’, जैसे अन्य सामरिक, आर्थिक और भूराजनीतिक कार्रवाई कर रहा है। इन सभी कार्रवाइओं के जरिये लम्बे समय से चीन अमरीका के गले की हड्डी बना हुआ है।

रूस, ईरान, चीन जैसे अन्य देश तेल के व्यापार डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा में कर रहे हैं। जरूरत के सामानों की अदला–बदली से भी काम चला रहे हैं। उन्होंने कई ‘रीजनल संगठन’ भी बनाये। इससे पेट्रो डॉलर और डॉलर पर निर्भरता कम हुयी है। इससे अमरीकी वर्चस्व को लगातार चुनौती मिल रही है।

पैक्स सिलिका में शामिल देशों के लाभ–हानि अलग–अलग हैं। उनकी आर्थिक स्थिति, तकनीकी क्षमता, प्राकृतिक संसाधन और अमरीका के साथ सम्बन्ध अलग–अलग हैं। इसके आधार पर इसमें चार तरह के देश शामिल हैं––

पहला, अमरीका इस पहल में केन्द्रीय भूमिका में होगा। उसकी कोशिश है कि उन्नत तकनीक, डेटा, पूँजी, खनिज संसाधन और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर उसका प्रभुत्व कायम हो। मुनाफे का सबसे बड़ा हिस्सा खुद रखेगा। तमाम देशों पर तरह–तरह के हथकण्डे अपनाकर उन्हें अपने हितों में ढालेगा। तबाही–बर्बादी का जिम्मेदार होगा लेकिन जिवाबदेही नहीं लेगा। छल–कपट, षड़यंत्र, तख्तापलट, युद्ध, सैन्य घुसपैठ, अंधराष्ट्रवाद, नीतिगत समझौते, आदि की मदद से तमाम देशों की जनता को बदहाल स्थिति में पहुँचायेगा। देशों की सम्प्रभुता, अखण्डता का विनाश करेगा। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की जगह तानाशाही की व्यवस्था कायम करने की कोशिश करेगा। उदाहरण के लिए, चीन, रूस या इनकी तरफ झुके देशों पर आर्थिक प्रतिबन्ध, युद्ध, घुसपैठ आदि। भारत को बाध्य करना की तेल अमरीका से खरीदो, ईरान और रूस से नहीं। सस्ते दामों पर उर्वरक चीन से नहीं, अमरीकी कम्पनियों से खरीदो, आदि। इन सबमें एआई का इस्तेमाल होगा।

दूसरा शेर अपने शिकार को खाने के बाद बचा हुआ हिस्सा लाकड़बग्घे, गीदड़ों, कुत्तों, आदि के लिए छोड़ देता है। वही स्थिति होगी अमरीकी नेतृत्व वाले विकसित पूँजीवादी देशों की। अब हूबहू तो नहीं हो सकती। मतलब इनमें से कुछ देशों का तकनीक में कुछ हिस्सा है। कुछ की अपनी सामरिक ताकत भी है। कुछ के पास अपनी प्राकृतिक सम्पदा भी है। कुछ का अनेक देशों पर प्रभाव भी है। उनकी हैसियत के हिसाब से कुछ कम या ज्यादा इन्हें भी मिल सकता है।  

तीसरा, अमरीकी दबाव वाले देशों का सबसे ज्यादा शोषण और उत्पीड़न होगा। उदाहरण के लिए, फिलिपीन्स के पैक्स सिलिका पहल में शामिल होने की अघोषित शर्त थी कि वहाँ ‘स्पेशल इकोनोमिक जोन’ बनाये जायें। मतलब ऐसी जगह जहाँ मजदूरों की हितों वाले कोई भी श्रम कानून न हों। वहाँ की जनता के विरोध के बाद भी ऐसा किया गया। ठीक इसी तरह कजाकिस्तान के सामने भी अघोषित शर्त थी कि उसे चीन के खेमें में शामिल नहीं होना होगा। यह इस देश की सम्प्रभुता पर हमला है। भारत में अमरीकी डेटा सेन्टर खुलेंगे जिसके लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत होगी। इस पहल में शामिल होने की पूर्वशर्त के रूप में भारत सरकार ने भूमि अधिग्रहण की नीतिओं को बदल दिया। अब जमीन के मालिक किसानों, पर्यावरण और मेहनतकशों के नुकासान को ताक पर रखकर भारत सरकार या प्रदेश सरकार जमीन कब्जा करेगी। ये चन्द नमूने भर हैं। इसकी फेहरिस्त बहुत लम्बी है। इन देशों की जनता को ही सबसे ज्यादा लूटा–पीटा जायेगा। उन्हें बदहाल–कंगाल बनाया जायेगा।

चैथा, अमरीकी वर्चस्व को चुनौती देने वाले देशों को अमरीकी आर्थिक प्रतिबन्ध, तकनीकी नाकेबन्दी, राजनीतिक दबाव और सैन्य तनाव झेलने पड़ेंगे। उन्हें तानाशाह घोषित किया जायेगा और सबसे बुरी व्यवस्था के रूप में प्रचारित किया जायेगा। कुल मिलाकर इन्हें भी अपनी सम्प्रभुता और स्वतंत्रता से कीमत चुकानी पड़ेगी। इस प्रकार वैश्विक शक्ति–संघर्ष की कीमत उन देशों की आम जनता को महँगाई, बेरोजगारी, सैन्य खर्च और सामाजिक असुरक्षा के रूप में चुकानी पड़ेगी।

आज दुनिया भर में एआई पर प्रभुत्व की लड़ाई जारी है क्योंकि यह तकनीकी विकास के साथ–साथ शोषण और लूट की असीम सम्भावनाओं के द्वार खोलती है। इसीलिए अमरीकी साम्राज्यवाद अपने पूँजी निवेश के संकट का समाधान के लिए एआई की मदद ले रहा है। वह अपने वर्चस्व को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इतिहास का सबक यह है कि कोई भी वर्चस्व स्थायी नहीं होता। विज्ञान और तकनीक पर किसी एक देश का स्थायी एकाधिकार अनुचित है, क्योंकि उनका आधार मानव समाज का सामूहिक श्रम और ज्ञान है। सवाल यह है कि दुनिया की जनता के सामूहिक श्रम से पैदा हुई तकनीकी सम्पदा किसके लिए–– कुछ साम्राज्यवादी ताकतों और एकाधिकारी कम्पनियों के मुनाफे के लिए या पूरी मानवता की भलाई के लिए? तकनीकी विकास को साम्राज्यवादी वर्चस्व का औजार बनाने के बजाय उसे मेहनतकशों की भलाई, सामाजिक प्रगति और जनता के व्यापक हित का साधन बनाया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि तकनीक, प्राकृतिक संसाधनों और उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पर जनता का नियन्त्रण हो।