कांचा गाजीबोवली–– मुनाफे ने मारा जंगल
पर्यावरण तसमिया फलकसोचिए एक सुबह खुला आसमान, ठण्डी हवा और मोर की आवाज सब अचानक खामोश हो जाये। पेड़ सूने खड़े हों, जमीन पर बस धूल हो और हवा में सिर्फ मशीनों की गूंज। हैदराबाद की कांचा गाजीबोवली की यही दर्दनाक कहानी है एक जमीन जो कभी जंगल थी, अब पूँजीपतियों के मुनाफे की बिसात बन चुकी है।
हैदराबाद में कांचा गाजीबोवली जंगल 400 एकड़ में फैला हुआ है। इस जंगल को ‘हैदराबाद का फेफड़ा’ कहा जाता है। तेलंगाना सरकार इस जंगल को कटवाकर आईटी पार्क बनवाना चाहती है। इसका स्थानीय लोग और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र लगातार विरोध कर रहे है। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्रों का कहना है कि यह जंगल यूनिवर्सिटी की सम्पत्ति है। इस पर सरकार की मनमानी नहीं चल सकती है। इसके साथ ही इस जंगल के काटने का मतलब है हैदराबाद को प्रदूषित हवा का नरक बना देना। इस पर सरकार का कहना है कि यह सरकार की सम्पत्ति है और विकास विरोधी लोग सरकार के काम में रोड़ा अटका रहे है।
इस जमीन को लेकर विवाद नया नहीं है। ‘द वायर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक में, जब तेलंगाना आन्दोलन पूरे उबाल पर था, तब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी को 2300 एकड़ जमीन देने की मंजूरी दी थी। जिसमें 400 एकड़ कांचा गाजीबोवली जंगल की जमींन भी शामिल थी। 2004 में चन्द्रबाबू नायडू सरकार ने इसे आईएमजी अकैडमिक्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी को स्पोर्ट्स सुविधा के लिए दिया। लेकिन वह डील रद्द हो गयी और तब से यह जमीन बार–बार अलग–अलग विभागों को सौंपी जाती रही।
2024 में कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया और तब से सरकार इसे अपना अधिकार मान रही है। यूनिवर्सिटी के छात्रों और पर्यावरणविदों का कहना है कि एक पुराना समझौता था कि बदले में यूनिवर्सिटी को 400 एकड़ जमींन दी जाएगी, जिसकी अब तक हदबन्दी नहीं हुई है। लेकिन सवाल सिर्फ जमीन का नहीं है। सवाल यह है कि प्रकृति की यह बेशकीमती नेमत तमाम जीव जगत और मानवता के हित में इस्तेमाल होनी चाहिए या चन्द मुनाफाखोर कम्पनियों के जो अपने आईटी पार्कों, बहुमंजिला कार्यालयों और अय्याशियों के लिए पूरी प्रकृति को तबाह कर रही हैं।
इस पर सरकार कम्पनियों के साथ मुस्तैदी से खड़ी है। उसका कहना एकदम साफ है कि यह जमीन ‘राज्य की सम्पत्ति’ है और इसका उपयोग आईटी पार्क और इण्डस्ट्रियल डेवलपमेंट के लिए किया जाएगा। सरकार के अनुसार, इस जमीन पर कोई कानूनी विवाद नहीं है। रमजान, ईद, गुड़ी पड़वा जैसे त्योहारों के चलते कोर्ट चार दिन बन्द था। इसी दौरान सरकार ने जंगल को खत्म करने का शर्मनाक कदम उठाया। इसकी किसी को भनक न लगे इसके लिए सरकार ने देर रात 2–3 बजे जंगल को तहस–नहस करना शुरू किया। सरकार ये मानकर चल रही थी कि जनता सोई रहेगी और जंगल की चीख किसी को सुनाई नहीं देगी। अगर सब सही है, तो इतनी चोरी–छिपी कार्रवाई क्यों?
जब इस इलाके में पेड़ काटने की कार्रवाई शुरू हुई तो छात्रों, शिक्षकों और यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्रों ने खुलकर विरोध किया। उनका कहना है कि ‘हैदराबाद के फेफड़े’ कंचा गाजीबौली की जमीन जैव विविधता से भरपूर है। यहाँ पेड़–पौधे और जीव–जन्तुओं की 455 से ज्यादा प्रजातियाँ पायी जाती हैं। यह इलाका सिर्फ खरपतवार की हरियाली नहीं है बल्कि मोर, भैंसे, झीलें, मशरूम जैसी चट्टानें और विशाल वृक्षों का अद्भुत आवास है।
इसी वजह से छात्र यूनियन, पर्यावरणविद लगातार यह माँग कर रहे है कि इस क्षेत्र को ‘बायो–हेरिटेज रिजर्व’ घोषित किया जाये। उनका कहना है कि इस इलाके का कोई भी हिस्सा अगर नष्ट होता है, तो इसका असर पूरे इकोसिस्टम पर पड़ेगा। मार्च के बीच में ही इस जमीन पर भारी मशीनें लाई गयी और खुदाई शुरू कर दी गयी। 30 मार्च को कई बुलडोजर वहाँ पहुँचे और पेड़ों की कटाई शुरू हो गयी, जबकि स्थानीय लोग और छात्र इसका विरोध कर रहे थे। एक्सपर्ट के अनुसार, लगभग 400 एकड़ के इस क्षेत्र में करीब 17,700 पेड़ थे, जिनमें से अब तक 10,000 से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके है। सरकार ने अब तक इस नुकसान पर कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं दिया है।
एक जिन्दा जंगल को सरकार ने मौत के मुँह में पहुँचा दिया। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी पूर्व और वर्तमान छात्रों, शिक्षकों और पर्यावरणविदों ने इसके खिलाफ कौर्ट में अपित की। 2 अप्रैल को कोर्ट ने पेड़ों की कटाई रोकने का आदेश दिया। फिर भी सरकार ने जंगल को तबाह करने का काम जारी रखा। 1 अप्रैल को 14 लोगों का प्रतिनिधि मण्डल मंत्रियों से मिला। उनसे जंगल बचाने की विनती की, पर नतीजा शून्य रहा। इस दौरान बिना किसी जवाबदेही के जंगल का काटा जाना जारी रहा। सरकार के इस रवैये से साफ जाहिर है कि अपनी चहेती कम्पनियों के लिए वह प्रकृति का विनाश करने से भी पीछे नहीं हटेगी।
हमारे देश के रहनुमा भारत के शहरों को यूरोप जैसा बनाना चाहते है। लेकिन उन्हें बस यूरोप की काँच की इमारतें दिखती हैं, जो भारत जैसे गरम देश में बिलकुल फिट नहीं बैठती। वे ये नहीं देखते कि यूरोप में हर सड़क के किनारे पेड़ है, हर मोहल्ले में पार्क है, हर शहर में हरियाली है।
भारत में जंगलों की कब्रों के ऊपर शीशे और कंक्रीट के शहर बनाये जा रहे है। इसी कारण यह दुनिया के उन पाँच देशों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। हर वर्ष तापमान का बढ़ना, बाढ़, सूखा, वायु प्रदूषण और बढती जानलेवा बीमारियाँ सब चेतावनी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसे में यदि हरे–भरे जंगलों को ही उजाड़ दिया जाये तो ऐसे शहरीकरण का क्या मायने है? कंक्रीट की इमारतों में बन्द हवा और मृत सन्नाटा क्या यही सभ्यता की पहचान है?
यही खेल हमने मुसी नदी के साथ भी देखा। नदी को ‘रिवरफ्रंट डेवलपमेंट’ के नाम पर गन्दे नाले में बदल दिया गया। अब वही चालबाजी कांचा गाजीबोवली में दोहरायी जा रही है। बड़े–बड़े बिल्डर और आईटी कम्पनियाँ मुनाफा कमाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों को उजाड़ रहे है। सरकार के लिए जंगल सिर्फ लकड़ी है, जमीन सिर्फ राजस्व है और नागरिक सिर्फ ‘वोट बैंक’।
कांचा गाजीबोवली जंगल किसी की निजी मिल्कियत नहीं है। बल्कि आम जनता की साझी अमानत है। आज सरकार इस अमानत को लुटा रही है और पूँजीपतियों में इसे हथियाने की होड़ मची है। असल में यह साझा संसाधनों की खुली डकैती है।
इनसानियत के लिए संसाधन कुदरत की नेमत है। पीढ़ियों से आम जनता इन संसाधनों का जायज इस्तेमाल करती आयी है। ये आम जनता की साझी मिलकियत के तौर पर ही महफूज रह सकते हैं। निजी कम्पनियों का मकसद इनसे जल्द से जल्द मुनाफा कूँटना है चाहे प्रकृति का विनाश ही क्यों न हो।
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