कोप–29 जलवायु शिखर सम्मेलन की असफलता
पर्यावरण सूरज गुप्ता24 नवम्बर को जलवायु शिखर सम्मेलन (कोप–29) अजरबैजान के बाकू शहर मे आयोजित हुआ। इसमे दो सौ देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बेशर्मी का आलम यह कि हर बार की तरह इस बार भी एक ऐसे देश ने इस सम्मेलन की मेजबानी की, जो पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुँचाता है। कितनी ही बार इस पर सवाल उठाये जाते रहे हैं, लेकिन आयोजकों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। पिछली बार कोप–28 की मेजबानी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने की थी, जो दुनिया के शीर्ष 10 तेल उत्पादक देशों में से एक है और एक बहुत बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश भी है। यही हाल इस साल भी रहा जब अजरबैजान ने कोप–29 की मेजबानी की।
इससे पहले 2015 में करीब 200 देशों ने पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1–5 डिग्री सेल्सियस तक कम करने का संकल्प लिया था। इस संकल्प का कैसा मजाक बनाया गया ? देखिए, सन 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है। यह है जलवायु सम्मेलनों की असफलता की जीती–जागती बानगी। आज वैश्विक तापमान में वृद्धि 1–5 डिग्री सेल्सियस को पार कर गयी है और मौसम में बेतहाशा उतार–चढ़ाव आने लगे हैं। इस साल भी बाढ़, गर्मी और तूफानों के कहर ने पुराने कई रिकॉर्ड तोड़ दिये। इन सभी आपदाओं में लाखों लोग असमय ही काल के गाल में समा गये।
जून 2024 में जलवायु परिवर्तन के चलते दुनिया भर में 60 फीसदी से ज्यादा आबादी को भीषण गर्मी झेलनी पड़ी। सिर्फ भारत में भीषण गर्मी और लू से हजारों लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी और 40,000 से ज्यादा लोगों में सन्दिग्ध हीटस्ट्रोक की घटनाएँ देखने को मिली। इसके कारण हर साल करीब 4 लाख लोग मौत का शिकार हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से मक्का, गेहूँ और अन्य प्रमुख अनाजों के उत्पादन में भी भारी गिरावट जारी है। दुनिया भर की तमाम फसलों पर इसका अलग–अलग दुष्प्रभाव हो रहा है। यह अनुमान सामने आया है कि साल 2030 तक जलवायु परिवर्तन और भूख से जुड़ी बीमारियों की वजह से इन मौतों की संख्या बढ़कर 7 लाख प्रति वर्ष हो सकती है। यह बहुत चिन्ताजनक बात है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले दुष्प्रभावों से बचाने के लिए हर साल 1,000 से 1,300 अरब डॉलर की धनराशि की जरूरत पड़ेगी। इस रकम से जलवायु प्रभावों के कारण होने वाले नुकसान और क्षति से निपटने के लिए गरीब और विकासशील देशों को मदद दी जाएगी। उनके लिए बचाव अनुकूलन के उपाय किये जाएँगे और स्वच्छ ऊर्जा की नयी प्रणालियों का भी निर्माण किया जाएगा। यह सब पहले भी कहा जाता रहा है, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं होता।
सम्मेलन में 130 से ज्यादा विकासशील देशों के प्रतिनिधियों ने विकसित देशों के सामने 1,300 अरब डॉलर (109,20,000 करोड़ रुपये) सालाना देने की माँग रखी। इसको नजरअन्दाज करते हुए विकसित देशों ने अपना अलग राग अलापना शुरू किया और जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए क्लाइमेट फाइनेन्स पोषण के रूप में हर साल 300 अरब डॉलर (25,20,000 करोड़ रुपये) की सहायता का प्रस्ताव रखा। इतनी विकराल समस्या के सामने यह राशि ऊँट के मुँह में जीरा से अधिक कुछ नहीं है। यह एक वैश्विक सम्मेलन में पिछड़े और विकासशील देशों का अपमान और उनका मखौल उड़ाने जैसा है। विकासशील देश भी अपनी माँग पर अड़े रहे। हर बार की तरह इस बार भी यह सम्मेलन एक शब्द नये जलवायु वित्त लक्ष्य (एनसीक्यूजी) के साथ बेनतीजा रहा और 22 नवम्बर 2024 को कोप–29 का सम्मेलन समाप्त हुआ।
हमने देश–विदेश के अंक 31 में कोप–24 और अंक 42 में कोप–27 पर लेख दिये थे। जलवायु सम्मेलनों को लेकर हमारा विश्लेषण और चिन्ता उस समय जितनी सटीक थी, वह इस सम्मेलन के बाद और भी पुष्ट हो गयी है। हमने कहा था कि इन सम्मेलनों की असफलता ने निराशा को बढ़ाया ही है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अपने राष्ट्रीय हितों, यानी वहाँ के पूँजीपतियों के संकीर्ण वर्गीय हितों को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इसी के चलते 2015 के पेरिस समझौते से निकले समाधान को इन देशों ने रद््दी की टोकरी में फेंक दिया है। इस बार का सम्मेलन भी इससे अलहदा नहीं रहा है। इन सम्मेलनों और इनमें होने वाली कार्रवाइयों से यह साफ नजर आ रहा है कि 2050 तक जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य मात्र एक कपोल कल्पना है।
––सूरज गुप्ता
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