बीते 6 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध तरीके से एक आदमी का घर गिराने के चलते उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगायी। इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस चन्द्रचूड़ और जस्टिस मनोज मिश्र की पीठ ने कहा कि नागरिको की आवाज को उनकी सम्पत्ति नष्ट करके नहीं दबाया जा सकता है। यह पहला मामला नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन के खिलाफ बोला हो, बल्कि इस से पहले 1 अक्टूबर को भी कोर्ट ने ऐसी कार्रवाइयों पर सख्त रोक लगाने का फैसला सुनाया था। लेकिन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में यह सिलसिला लगातार चलता रहा। इसके चलते कोर्ट को 13 नवम्बर को अपना फैसला दोबारा सुनाना पड़ा। कोर्ट ने अवैध ध्वस्तीकरण पर अधिकारियों को फटकारते हुए उनसे निर्माण के पैसे वसूलने का आदेश दिया। कोर्ट ने ऐसी कार्रवाई को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि यह दोषी के पूरे परिवार को सामूहिक दण्ड देने के समान है। इस तरह पिछले 2 महीने में कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन के खिलाफ 3 बार फैसला सुनाया।

पिछले कुछ सालों में आरोपी के घर को अवैध निर्माण बताकर गिरा देना भाजपा शासित सरकारों में एक पैटर्न सा बन गया है। इसी साल लखनऊ के अकबरपुर कॉलोनी में पिछले 50 सालों से रह रहे लोगों के 200 से अधिक घरों को अवैध बताकर ध्वस्त कर दिया गया। मध्य प्रदेश के मण्डला और रतलाम जिलों में गोवंश होने के शक में कुछ घरों को बुलडोजर से गिरा दिया गया। बाद में जाँच में गोवंश की बरामदगी नहीं हुई। मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले घर भी अवैध बताकर गिरा दिये गये। दरअसल, भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारें  पत्रकारों के भी घर गिरा रही है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के महाराजगंज निवासी एक पत्रकार ने सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ लिख दिया। उसके घर को अवैध बताकर ध्वस्त कर दिया गया। उस पत्रकार ने इसके खिलाफ अपने चैनल के जरिये आवाज उठायी। इससे सुप्रीम कोर्ट को इस घटना का स्वत: संज्ञान लेना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के एक्शन को गलत माना और पत्रकार के नुकसान की भरपाई करने के लिए 25 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि उसके द्वारा आरोपियों के केवल अवैध निर्माण को ही गिराया जाता है। लेकिन जब आरोपी भाजपा नेता या भाजपा से जुड़े किसी संगठन से सम्बन्ध रखता है तब सरकार का कोई एक्शन नहीं होता है। हाउसिंग एण्ड लैण्ड राइट्स नेटवर्क की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल साल 2023 में ही एक लाख से अधिक घरों को सरकार द्वारा तोड़ा गया। इनमें से अधिकतर परिवारों को कोई पूर्व सूचना नहीं दी गयी। इस रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2023 तक बुलडोजर एक्शन में 44 फीसदी मुस्लिम, 23 फीसदी आदिवासी और 22 फीसदी दलितों के घर तोड़े गये। इससे साफ जाहिर होता है कि इनके निशाने पर दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक ही हैं। सरकार के इस अत्याचार का कोर्ट ने बहुत देर बाद संज्ञान लिया। खैर, देर आयद, दुरुस्त आयद। अगर अब भी सरकार के इस जनविरोधी रवैये पर रोक नहीं लगती, तो जनता का आक्रोश बढ़ता जायेगा जो सरकार के लिए विनाशकारी होगा।

–– सुहैल