खनन एवं खनिज अधिनियम, 2026 : पूँजीपतियों की लूट का इन्तजाम
राजनीतिक अर्थशास्त्र मोहित भारतीबीते 13 और 14 अगस्त को सरकार ने खनन एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 लोकसभा और राज्यसभा मे विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद ध्वनि मत से पास करा लिया है। इस संशोधन विधेयक के जरिये केन्द्र सरकार ने खनिज जमीनों पर लगने वाले कर और नीलामी का पूरा नियंत्रण राज्य सरकारों से छीनकर अपने हाथों में ले लिया है। केन्द्रीय खनन मंत्री जी किशन रेड्डी ने इस संशोधन की तारीफ करते हुए कहा कि यह खनन क्षेत्र में पारदर्शिता लाएगा और निजी पूँजी निवेश के जरिये उन्नत तकनीक आएगी जिससे देश महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भर बनेगा। वहीं दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियाँ, किसान संगठन, पर्यावरणविद समेत अनेक आदिवासी संगठन इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। विपक्षी पार्टी इस कानून को देश के संघीय ढाँचे पर हमला बता रही हैं। केरल, झारखण्ड, तमिलनाडु आदि की राज्य सरकारों ने संशोधन को संविधान विरोधी करार दिया और इसके खिलाफ आन्दोलन करने की चेतावनी दी है। वहीं संयुक्त किसान मोर्चे ने इसे देश की प्राकृतिक सम्पदा और सुरक्षा को मुट्ठीभर कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने वाला बताया है। आदिवासी संगठनों ने इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताया है।
चैतरफा विरोध के बाद भी केवल तीन दिनों के अन्दर इसकी विधायी प्रक्रिया पूरी कर दी गयी। आखिर भाजपा सरकार को इस संशोधन कानून को पारित करने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? इसके पीछे का एक कारण कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को बताया जा रहा है जिसमें राज्य सरकारों को खनन कम्पनियों से अतिरिक्त कर वसूलने की अनुमति दी थी। अब इस नये संशोधन अधिनियम के जरिये सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। इसके इतिहास में बिरले ही उदहारण हैं। टाटा स्टील, सेल, अडानी, जेएसडब्लू और खनन क्षेत्र की अन्य कम्पनियाँ की पिछली सभी देनदारी माँफ कर दी गयी है। इसके चलते झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, राजस्थान आदि राज्यों को 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ है।
संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार खनिज सम्पदाओं पर राज्य का अधिकार है लेकिन मौजूदा संशोधन अधिनयम के जरिये मोदी सरकार इस अधिकार को कुचलने पर आतुर है। यह कानून केवल राज्यों की स्वायत्तता खत्म करने तक सीमित नहीं है। बल्कि पहले 2023 और अब 2026 में दो बड़े संशोधन कर मोदी सरकार ने 1957 के मूल खनन एवं खनिज कानून को पूरी तरह पलट दिया है। इन दोनों संशोधनों को एक साथ देखने से ही पूरी तस्वीर समझी जा सकती है।
1957 में बनाये गये कानून का उद्देश्य देश के महत्वपूर्ण खनिजों का सुरक्षित तरीके से खनन करना था, जोकि पर्यावरण और स्थानीय लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। यह प्रावधान रखा गया था कि सामरिक और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों का खनन केवल सरकारी कम्पनियाँ कर सकती थीं जिससे इनपर किसी निजी पूँजीपति के एकाधिकार को बनने से रोका जा सके। लेकिन पिछले 3 साल में दो बार संशोधन कर सरकार ने पुराने कानून का आधार ही खत्म कर दिया है। भाजपा सरकार ने सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव लिथियम, टाइटैनियम, बेरिलियम, नियोबियम, टैण्टलम और जिरकोनियम जैसे छह बेहद महत्वपूर्ण सामरिक खनिजों को देशी–विदेशी पूँजीपतियों के लिए खोलकर किया है। सरकार का तर्क है कि इससे देश में अत्याधुनिक बैटरियों और रक्षा उपकरणों का निर्माण बढ़ेगा, लेकिन इस संशोधन के 4 साल के अन्दर हुए बदलावों पर नजर डालें तो बेहद भयावह तस्वीर नजर आ रही है।
खनन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार पिछले तीन साल में 7 चरणों की कुल 56 नीलामियों में से एक भी खनन ब्लॉक सरकारी कम्पनियों को नहीं दिया गया है। 2023 के संशोधन से पहले ये सभी महत्वपूर्ण खनन सरकारी कम्पनियों के पास थे अब यह सभी निजी हाथों में सौंप दिये गये हैं। छोटे स्थानीय खनन और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियाँ महत्वपूर्ण खनिजों के खनन से पूरी तरह से बाहर कर दी गयी हैं जिससे देश के प्राकृतिक संसाधनों पर गिने–चुने बड़े औद्योगिक घरानों का एकाधिकार स्थापित होने का रास्ता साफ हो गया।
खनिज भविष्य की तकनीकी का आधार हैं जिनकी कीमत लाखों करोड़ रुपये की है लेकिन सरकार इन्हें औने–पौने दामों पर पूँजीपतियों के हवाले कर रही है। 2023 में सरकार द्वारा 20 ब्लाक की नीलामी की गयी जिनका मूल्य वास्तविक कीमत से 5 गुना तक कम रखा गया था। ओडिशा के जाजपुर में ‘नेल्को’ के आस–पास के बॉक्साइट और कोयला ब्लॉक्स भी वेदान्ता और अडाणी जैसे समूहों को दे दिये गये। भविष्य में बैटरी और इलेक्ट्रिक कारों के लिए अनिवार्य लिथियम, कोबाल्ट जैसे खनिजों को बेहद कम दामों पर पूँजीपतियों के हावले किया जा रहा है जिससे कुछ ही सालों में ऊर्जा समेत अन्य खनिज क्षेत्रों में इनका एकाधिकार कायम हो जाएगा।
इस क्षेत्र की सरकारी निगमों में कार्यरत लाखों लोगों के रोजगार पर भी संकट के बादल मँडरा रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इन कम्पनियों में घाटा दिखाकर कई बार छँटनी की गयी है। खनन में काम करने वाले मजदूरों को तपती धूप में, धूल और गर्द के बीच, जमीन से सैकड़ों फीट नीचे अँधेरी और खतरनाक सुरंगों में उतरकर काम करना पड़ता है, जहाँ हर क्षण जान का जोखिम बना रहता है। सरकारी कम्पनियों, जैसे कोल इण्डिया या नालको में काम करने वाले मजदूरों के पास एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा चक्र होता था। लेकिन अब इन क्षेत्रों में निजी पूँजी के प्रवेश से ठेका मजदूरों से यह काम बेहद कम पैसों में किसी भी सुरक्षा मानक का पालन करवाया जाएगा।
इसके साथ ही सरकार पुराने कानून की सभी सुरक्षात्मक प्रावधानों को भी खत्म कर रही है। पहले खनन के नियम पारिस्थितिकी को ध्यान में रखकर बनाये गये थे। अब यह पूँजीपतियों के मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाये जा रहे हैं। इनमें सबसे खतरनाक बदलाव ‘एक्सप्लोरेशन लाइसेंस’ देने के प्रावधान में किया गया है। इस नये प्रावधान के तहत किसी भी निजी कम्पनी को खनिज की खोज करने के नाम पर एक बार में एक हजार वर्ग किलोमीटर तक का विशाल भूभाग आवंटित करने और तीन साल बाद उसका एक तिहाई हिस्सा अपने पास रखने की कानूनी अनुमति दे दी गयी है। पहले के मुकाबले यह क्षेत्र तीन गुना से भी अधिक बढ़ा दिया गया है। यह भूभाग देश के कई बड़े महानगरों के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक है। इसमें सैकड़ों आदिवासी गाँव, सदियों पुराने जंगल और समृद्ध वन्यजीव गलियारे पूरी तरह समा जाएँगे। अब यह भरपूर संसाधन सम्पन्न जमीन पूँजीपतियों को परोसी जा रही है।
इसके साथ ही सामरिक खनिजों की खोज के नाम पर अब निजी कम्पनियों को घने वन क्षेत्रों के भीतर प्रति दस वर्ग किलोमीटर में साठ से अस्सी गहरे बोरहोल्स करने की खुली छूट दे दी गयी है जोकि पहले मात्र 10 थी। सबसे खतरनाक बात यह है कि इस पूरी खुदाई प्रक्रिया को ‘फॉरेस्ट क्लीयरेंस’ के दायरे से बाहर कर दिया है, यानी अब पूँजीपतियों जितना चाहे उतना प्रकृति का दोहन कर सकते हैं उनपर कोई कानून लागू ही नहीं होगा। घने, अछूते जंगलों के बीच अस्सी गहरे गड्ढे खोदने के लिए भारी–भरकम ड्रिलिंग मशीनों, ट्रकों, डीजल जनरेटरों और सैकड़ों मजदूरों की आवाजाही हो रही है। जंगलों में इस तरीके से अवैध खनन को मंजूरी देने के दुष्परिणाम सामने भी आ रहे हैं। ओडिशा में खनन प्रधान जिले क्योंझर और सुन्दरगढ़ में हाथियों के प्रकृतिक गलियारे को नष्ट कर दिया गया है जिसके चलते हाथी आबादी वाले क्षेत्रों में आ रहे हैं और ग्रामीणों पर इनके हमलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जिससे पिछले साल 171 लोगों की जान चली गयी। इसी तरह झारखण्ड के सरण्डा जंगल जोकि एशिया का सबसे बड़ा साल वन है, वहाँ अत्यधिक खनन के कारण कई इलाकों में राज्य सरकार द्वारा ‘हाथी आपातकाल’ तक घोषित कर दिया गया है। इसी तरह महाराष्ट्र के चन्द्रपुर में प्रस्तावित खनन योजना के लिए बाघ गलियारे के लगभग 18 हजार से अधिक पेड़ काटने का फैसला लिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे 300 बाघों समेत अनेक वन्य जीवों के आवास नष्ट हो जाएँगे और पूरे इलाके की पारिस्थितिकी संकटग्रस्त हो जाएगी।
2026 के संशोधन अधिनियम का सबसे खतरनाक कदम खनन अपराधों का ‘डिक्रिमिनलाइजेशन’ यानी उन्हें आपराधिक श्रेणी से बाहर करना है। पुराने कानूनों के तहत अगर कोई कम्पनी तय सीमा से अधिक खनन करती थी, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती थी तो कम्पनी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज करने का प्रावधान था। यह कानून लम्बे समय से पूँजीपतियों के लिए एक बाधा बना हुआ था जिसे अब सरकार ने एक झटके में खत्म कर दिया है। बीते कुछ साल पहले गोवा में लौह अयस्क के अवैध खनन के जरिये निजी कम्पनियों ने 35 हजार करोड़ रुपये का घोटाला किया था और पर्यावरण कानूनों को तोडा था। पुराने नियमों के तहत उन पर सख्त अदालती कार्रवाइयाँ हुर्इं और खनन पर रोक लगा दी गयी थी। अब जिन कम्पनियों का मुनाफा अरबों रुपये में हो, उनके लिए कुछ लाख या करोड़ रुपये का जुर्माना देना मामूली बात है। वे आसानी से जुर्माना भरेंगी और देश के संसाधनों की अन्धाधुन्ध दोहन करेंगी।
ओडिशा की सुकिन्दा घाटी में क्रोमियम अयस्क की अन्धाधुन्ध ओपन–कास्ट खनन के कारण पूरी घाटी का भूजल ‘हेक्सावेलेण्ट क्रोमियम’ जैसे अत्यधिक कैंसर पैदा करनेवाले रसायन से दूषित हो गया है। ब्राह्मणी नदी का पानी जहर बन गया, जिसके चलते स्थानीय आबादी में कैंसर, फेफड़ों की गम्भीर बीमारियाँ और नवजात बच्चों में अपंगता की दरें भयानक रूप से बढ़ गयी हैं। अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं ने सुकिन्दा को दुनिया के सबसे प्रदूषित स्थानों में गिना है। सुकिन्दा जैसी सैकड़ों पर्यावरणीय आपदाएँ पूरे देश में विस्तार कर सकती हैं।
अधिकांश कीमती खनिज उन्हीं क्षेत्रों और जंगलों में हैं जहाँ देश की बहुसंख्यक आदिवासी आबादी रह रही है। आदिवासियों ने लम्बे संघर्ष और कुर्बानियाँ देकर ‘पेसा’ और ‘वन अधिकार अधिनियम’ जैसे कानून बनवाये थे। इन कानूनों ने ग्राम सभा और आदिवासियों को यह अधिकार दिया था कि उनकी जमीन पर किसी भी खनन या विकास परियोजना से पहले उनकी सहमति लेना अनिवार्य है। इसके साथ ही इन कानूनों ने आदिवासियों को अपनी पारम्परिक वन भूमि पर खेती करने, रहने और महुआ, तेन्दूपत्ता जैसे वन–उपज को इकट्ठा कर बेचने का हक दिया था, यह अधिकार उनकी आजीविका के लिए बेहद जरूरी हैं। साल 2013 में ओड़िसा की डोंगिरिया कोंध आदिवासी समुदाय की 12 ग्राम सभाओं ने अपने इन्हीं कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर ब्रिटेन की दिग्गज कम्पनी वेदान्ता की खनन परियोजना को रुकवा दिया था। इन कानूनों के रहते पूँजीपतियों के लिए देश की खनिज सम्पदा पर कब्जा करना मुश्किल हो रहा था। इसलिए इन्हें खत्म करना इनके लिए बेहद जरूरी था। यही काम मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही ‘व्यापार की सुगमता’ के नारे के साथ करना शुरू कर दिया था। आदिवासियों के सुरक्षा कवच कहे जाने वाले ये कानून अब मोदी के इसी नारे की भेट चढ़ गये हैं। खनन एवं खनिज अधिनियम संशोधनों में ‘पेसा’ और ‘वन अधिकार अधिनयम जैसे तमाम’ प्रावधानों को एक झटके में खत्म कर दिया गया है।
इसका नतीजा पहले से कही अधिक विस्थापन और पर्यावरण की बर्बादी के रूप में नजर के रूप में नजर आ रहा है। सिंगरौली जैसे कोयला क्षेत्रों में अब तक 3 लाख से अधिक स्थानीय लोग अपने गाँव, घर और जंगल से विस्थापित हो चुके हैं। इसके अलावा ओडिशा के कोरबा क्षेत्र में खनन विस्तार से घने जंगलों और कृषि भूमि में भारी गिरावट आयी है। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में केवल कोयला और खनिज निकालने के लिए अब तक 8 हजार से अधिक आदिवासी अपनी जमीनों से उजाड़े जा चुके हैं। राजस्थान से दिल्ली तक फैले अरावली क्षेत्र में खनन के कारण लगभग 32 प्रतिशत वन क्षेत्र नष्ट हो चुका है, जिसमें लाखों प्राचीन पेड़ और औषधीय पौधे शामिल थे। नदियों के सूखने, भूजल और खानों के खाली गड्ढों में दूषित पानी जमा होने के कारण बड़े पैमाने पर जल स्रोत जहरीले हो चुके हैं। इसके अलावा, खदानों के खाली गड्ढों में जमा दूषित पानी के कारण आसपास की नदियाँ और भूजल में नाइट्रेट जैसे प्रदूषक बढ़ रहे हैं। कई स्थानों पर पानी का टीडीएस स्तर 1400 तक पहुँच चुका है, जिससे स्थानीय किसानों की फसलें बर्बाद हो रही हैं और लोगों के लिए पीने के पानी की समस्या और बढ़ गयी है। वे अपने पुस्तैनी गाँवों को छोड़ने को मजबूर हैं। यह संशोधन आदिवासियों को उनकी आजीविका, संस्कृति और पहचान से बेदखल कर रहा है।
आदिवासियों को मिलने वाली नामात्र की सुविधाओं को भी छीन लिया जा रहा है। अब ‘डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउण्डेशन’ जैसी कल्याणकारी संस्थाओं को भी पंगु बना दिया गया है। यह संस्था कम्पनियों के मुनाफे का एक हिस्सा विस्थापित लोगों को साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च करती थी। अब यह फण्ड भी केन्द्रीय सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है।
जब हम 2023 और 2026 के इन दोनों विधायी संशोधनों को एक साथ जोड़कर देखते हैं, तो देश के संसाधनों के दोहन, आदिवासियों का दमन, पर्यावरण विध्वंश की एक मुकम्मल और भयानक तस्वीर नजर आ रही है। अब बिना किसी कानूनी बाधा के निजी कम्पनियों की भारी मशीनें पुलिस बल के संरक्षण में आदिवासियों के खेतों और जंगलों को रौंद रही हैं। अगर वे इसका विरोध कर रहे हैं तो स्थानीय प्रशासन और फौज उन्हें अपनी बूटों तले कुचल रहे हैं। लेकिन सरकार के लाख दमन के बाद भी आदिवासियों के संघर्ष हर रोज एक नयी ऊर्जा और पहले से कहीं अधिक जिजीविषा के साथ उठ खड़े हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य से लेकर ओडिशा की सिजिमाली पहाड़ियों तक और झारखण्ड के खनिज क्षेत्रों से लेकर राजस्थान की अरावली पर्वतमाला तक, आदिवासी और अन्य मेहनतकश जनता इनके खिलाफ सड़कों पर है। आदिवासी महिलाएँ पेड़ों से चिपककर देश के फेफड़ों को बर्बाद होने से बचाने का प्रयास कर रही हैं। यह संघर्ष केवल आदिवासियों का नहीं बल्कि पूरे देश की मेहनतकश जनता का है। भाजपा सरकार के इन मंसूबों को जनता का संगठित और अनुशासित संघर्ष ही चुनौती दे सकता है।