भारत में बढ़ती गैर–बराबरी पर ऑक्सफेम की ताजा रिपोर्ट चैकाने वाली है जिसके अनुसार भारत की कुल सम्पत्ति के 40 फीसदी से ज्यादा हिस्से पर 1 फीसदी चोटी के अमीरों का कब्जा है। पिछले 10 सालों में इनकी सम्पत्ति 121 फीसदी बढ़ी है। देश की सम्पत्ति पर कब्जा करने में यहाँ के अमीरों ने अमरीका और ब्राजील जैसे देशों के अमीरों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत के सबसे गरीब 50 फीसदी जनता का देश की कुल सम्पत्ति में हिस्सा घटकर महज 3 फीसदी रह गया है।

सरकार यह दावा कर रही है कि 7 फीसदी की वृद्धि दर के साथ भारत दुनिया की चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था बन चुकी है और आने वाले कुछ सालों में जर्मनी को पछाड़कर यह तीसरा नम्बर हासिल कर लेगी। इस दावे को मुँह चिढ़ाती देश की बहुसंख्यक आबादी की भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी और आत्महत्याएँ सरकार की नजरों में चुभती हैं। जैसे वे उनके लिए भयावह दृश्य हों। वहीं मुट्ठीभर धनाढ्यों के स्वर्ग निर्माण और विकास की चमक पर अपनी पीठ थपथपा रही है।  

अंग्रेजों के समय छोटे उत्पादकों, किसानों और मजदूरों को तबाह कर दिया गया था। लाखों लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ते हुए जेल की काल कोठरी में अपनी जवानी गँवाई। मोदी राज न तबाही के उस दौर को कब का पीछे छोड़ दिया है। अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के अनुसार, अंग्रेजों ने भारत से अपने 200 सालों के औपनिवेशिक शासन के दौरान जितनी सम्पत्ति लूटी, इन मौजूदा एक फीसदी अमीरों ने उतनी सम्पत्ति महज पिछले 10 सालों में लूट ली है। इन लूट और कत्लोगारत की रफ्तार अंग्रेजों से 17 गुना तेज है।

पूँजीपति, उद्योगपति, सट्टेबाज, बड़े डील डिस्ट्रीब्यूटर तथा निर्माण उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा और सेवा क्षेत्र के विभिन्न व्यवसायों के मालिक, सरकारी अधिकार, राजनैतिक पार्टियों के नेता, यानी परजीवी लोगों का समूह ही ऊपरी एक फीसदी तबके का निर्माण करता है। यह तबका खुद कुछ नहीं करता, बल्कि जोंक की तरह मेहनतकश जनता का खून चूस कर मौज उड़ाता है। यह बड़े–बड़े बंगले और फार्महाउस में रहते हैं। महँगी गाड़ी से लेकर प्राइवेट जेट में यात्रा करते हैं। इनके पास अय्याशी के तमाम साधन मौजूद हैं। यह गिरोह अथाह पूँजी का मालिक, तकनीक सम्पन्न, मौजूदा व्यवस्था का पक्का समर्थक और जन–आन्दोलन का प्रखर विरोधी है। ये अपनी तरक्की ही देश की तरक्की समझता है।

हाल ही में प्रकाशित हूरून रिपोर्ट ने यह खुलासा किया कि देश के केवल 10 खरबपतियों के पास जीडीपी का 10 फीसदी, यानी 34 लाख करोड़ रुपये की सम्पत्ति है जो निर्धनतम 50 करोड़ लोगों की सम्पत्ति से भी ज्यादा है। इस अति धनाढ्यों की सूची में अम्बानी, अडानी, बंसल, अग्रवाल आदि शामिल हैं। इनका ऊर्जा, टेलीकॉम, आईटी, रिटेल आदि क्षेत्रों पर एकाधिकार है। ये सरकार के लिए ‘यूनिकॉर्न’ और मुख्यधारा की मीडिया के लिए विकास के पर्याय हैं। क्रिकेटर और फिल्मी सितारे इनके आगे मुजरा करते हैं। 2020 में प्रधानमंत्री मोदी ने इनकी चरण वन्दना करते हुए कहा था कि “हमें देश के वेल्थ क्रिएटर्स का सम्मान करना चाहिए–––”

ब्लूम वेंचर्स की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 100 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास खर्च करने के लिए रुपये ही नहीं है। वे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में भी अक्षम हैं। वे कर्ज के जाल में बुरी तरह फँसे हुए हैं। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत बहुसंख्यक मजदूरों के लिए कोई श्रम कानून नहीं है। हालाँकि वे देश की नींव हैं जिनकी मेहनत से सारे खेत और कारखाने गतिमान हैं। श्रम–मंत्रालय के मुताबिक इनकी औसत मासिक मजदूरी 10 हजार रुपये से भी कम है, इनमें महिला मजदूरों की स्थिति और भी खराब है। उनकी मासिक औसतन आय 5 हजार रुपये से भी कम है।  एक आँकड़े के अनुसार संगठित क्षेत्र में पैदा होने वाले हर 10 रुपये में मजदूर वर्ग को केवल 10 पैसे मिलते हैं यानी 0–1 प्रतिशत। बाकी धन कहाँ जाता है, यह साफ है।

सरकार के श्रम मंत्री प्रतिदिन के लिए न्यूनतम–स्तरीय मजदूरी 154 रुपये करने की घोषणा कर चुके हैं यानी मासिक मजदूरी महज 4628 रुपये। इतने कम पैसों में परिवार का भरण–पोषण क्या सम्भव है? यह शहरों की तंग गलियों में छोटे–छोटे कमरों में 10 से 12 की संख्या में रहने को मजबूर हैं। सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि महँगी स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते कर्ज जाल में फँसकर हर सेकण्ड में दो लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

मोटी तनख्वाह पाने वाले ह्वाइट कॉलर कर्मचारियों पर भी अब संकट के बादल मँडरा रहे हैं। पिछले साल केवल आईटी क्षेत्र में 65 हजार से ज्यादा नौकरियाँ खत्म कर दी गयीं। स्थायी नौकरियों की जगह ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया जा रहा है। महँगी शिक्षा के बाद 8–10 हजार रुपये की जोमैटो–ब्लिंकिट डिलीवरी बॉय की नौकरी मिलना क्या कोई खुशी की बात है? दूसरी तरफ इन्हीं कम्पनियों का अधिकारी हर महीने 50 लाख रुपये से अधिक कमाता है।

नेशनल क्राइम रिकॉड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिदिन 30 किसान और खेतिहर मजदूर कंगाली और कर्ज के बोझ के चलते आत्महत्या करने को मजबूर हैं। देश की 60 फीसदी महिलाएँ खून की कमी का शिकार हैं तो जबकि 35 फीसदी बच्चों को पोषणयुक्त आहार नसीब नहीं है। पिछले 3 सालों में गौतम अडानी की सम्पत्ति में 230 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं एक सामान्य नौकरी पेशा व्यक्ति की वास्तविक आय बढ़ना तो दूर, उल्टे, उसमें 3 फीसदी की गिरावट आयी है।

आज अडानी प्रकरण सत्ता और पूँजी के नाजायज गठजोड़ की खुली किताब है। 2014 में मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही अम्बानी, अडानी जैसे चहेते पूँजीपतियों के लिए सरकारी खजाना खोल दिया था। 2014 से 2023 तक गौतम अडानी की सम्पत्ति 3 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 15 लाख करोड़ रुपये हो गयी जो 2023–24 के कुल बजट का 27 फीसदी है। इससे देश के सभी जिलों में अस्तपाल का निर्माण, करोड़ों बेघरों के लिए आवास का निर्माण और मजदूरों–किसानों को कर्ज के जाल से आजाद किया जा सकता था।

2019 में मोदी सरकार ने अपने यार अडानी को 6 प्रमुख हवाईअड्डे कोड़ियों के भाव दे दिये। इसके लिए कानूनों को भी बदल दिया गया। जैसे 2020 में ‘कोयला खनन नीलामी नीति’ में ही बुनियादी बदलाव कर उसे अडानी को भेंट कर दिया गया। 2022 में अडानी को 8 हजार हेक्टेयर जमीन ग्रीन एनर्जी के लिए दे दी गयी। यह सूची बहुत लम्बी है और अम्बानी भी सौभाग्यशाली हैं जिन्हें मोदी सरकार की कृपा प्राप्त हुई है।

यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि कॉर्पाेरेट टैक्स में 8 फीसदी की कमी से सरकार के चहेते पूँजीपतियों को कितना फायदा हुआ होगा। दूसरी ओर, जीएसटी से जनता की कतर तोड़ दी गयी है। सरकार के ही आँकड़ों के अनुसार, 64 फीसदी से अधिक जीएसटी निर्धनतम 60 करोड़ लोगों से वसूली जा रही है, जबकि 10 फीसदी अमीरों से केवल 4 फीसद। पिछले 10 साल में इनके 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कर्ज माफ कर दिये गये जबकि छोटे कर्जे से लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

पूँजीपतियों पर यूँ ही मोदी सरकार मेहरबान नहीं है, बदले में उसकी पार्टी को बेहिसाब चन्दा मिलता है। इलेक्ट्रोल बॉण्ड के जरिये 2018–23 में चुनावी पार्टियों को 120 हजार करोड़ रुपये चन्दा मिला जिसमें से 95 फीसदी हिस्सा भाजपा का है। पनामा पेपर्स घोटाले में 500 से ज्यादा भारतीयों के नाम थे, जिनके साथ सरकार बेशर्मी से खड़ी है। इससे चुनाव में पूँजी का खेल और नेताओं–मंत्रियों की खरीद–फरोख्त जारी है। पूँजीपतियों के पक्ष में जनविरोधी नीतियों को निर्मम तरीके से लागू किया जा रहा है। देश का फेफड़ा कहे जाने वाले मध्य भारत के जंगलों में मौजूद खनिज को पूँजीपतियों के लिए आदिवासियों को खदेड़ा जा रहा है। विरोध करने वालों को नक्सली कहकर मारा जा रहा है। क्या यह लूटतंत्र नहीं है?

इन्फोसिस के नारायणमूर्ति हो या फिर एलएनटी के चेयरमैन, मजदूरों के लिए सप्ताह में 60, 72 और 90 घंटे तक काम करने की बिन माँगी सलाह दे रहे हैं। हफ्ते में मिलने वाली एक छुट्टी भी इन्हें बर्दाश्त नहीं हो रही है। हाल ही में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सभी सरकारों को शख्त हिदायत दी कि वह फ्रिबिज यानी जनता को किसी तरह की भी सुविधा मुफ्त में न दे। जस्टिस गवई ने तो यहाँ तक कहा कि महाराष्ट्र में चुनाव से पहले घोषित मुफ्त सुविधाओं के कारण किसानों को खेतों में काम करवाने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। न्यायपालिका का मजदूर विरोधी नजरिये का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा? जबकि अमीरों द्वारा करोड़ों के गबन पर न्यायाधीश मौन हैं।  

आज सरकार खुलेआम देशी–विदेशी पूँजी की चाकरी कर रही है। सत्ता ने लोकतन्त्र का लबादा उतार फेंका है और वह खुली–नंगी तानाशाही पर उतर आयी है। वह जल, जंगल, जमीन को नष्ट करके अमीरों की तिजोरी भरने का रास्ता साफ कर रही है।

एकाधिकारी वित्तीय पूँजी का युग यही है जिसमें विकास का एकमात्र उद्देश्य है पूँजी का कुछ हाथों में अधिक से अधिक संचय, उसका संकेद्रण और केन्द्रीकरण। इसमें नैतिकता, मानवता और प्रकृति के लिए कोई जगह नहीं है। इनका भगवान केवल मुनाफा है। नवउदारवाद ने मुट्ठीभर लोगों के लिए स्वर्ग का निर्माण किया है, जिसकी कीमत करोड़ों लोग चुका रहे हैं।

1990 में नयी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से ही यह सब चल रहा है। उस समय मनमोहन सिंह का यह दावा कि “इन सुधारों से भारत विकास के नये कीर्तिमान खड़े करेगा, जीडीपी छलांग मारकर आगे बढ़ेगी” पाखण्ड बन गयी है। आईएमएफ ने इसे भारत का आर्थिक पुनर्जागरण बताया था। यह कहा कि देश में जितने ज्यादा अमीर होंगे उतना देश को फायदा होगा, इनसे रिस–रिसकर धन–सम्पदा गरीबों तक जाएगी। आज ये बातें झूठी साबित हो गयी हैं। फोर्ब्स की बिलियनेयर रैंकिंग के अनुसार, 1991 में भारत में केवल एक खरबपति था। आज 271 हैं, जबकि गरीबी में भी अभूूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। सवाल है कि जब भारत के शासक वर्ग, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और डब्ल्यूटीओ का झूठ बेनकाब हो गया है, तब इन्हें कटघरे में कौन खड़ा करेगा?