ट्रम्प का नवफासीवादी आचरण

डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरी बार अमरीकी राष्ट्रपति चुने जाने के बाद वहाँ की राजनीति में नवफासीवादी उभार की चर्चा फिर से गर्म हो गयी। 2016 के अपने पहले चुनाव अभियान से लेकर इस चुनाव तक ट्रम्प ने जो बयानबाजियाँ कीं, चुनाव में जिन कुख्यात फासीवादी संगठनों और व्यक्तियों का समर्थन हासिल किया तथा अपने कार्यकाल में जो फैसले लिये उनसे यह सच्चाई निर्विवाद रूप से सामने आ गयी है कि उनका आचरण नवफासीवादी है। ट्रम्प ने अपने नवफासीवादी आचरण को कथनी और करनी दोनों से ही पुष्ट किया है जिसे हम इन तथ्यों की रोशनी में समझ सकते हैं––

* 2016 के चुनाव अभियान में ट्रम्प ने कहा था कि अगर मैं नहीं जीतता तो चुनाव परिणाम को स्वीकार नहीं करूँगा। 2020 में जो बाइडेन से हार जाने के बाद ट्रम्प और अन्य रिपब्लिकन नेताओं ने चुनाव में धोखाधड़ी के आरोप लगाकर चुनाव परिणाम को पलटने की कोशिश की। अमरीकी राजधानी भवन वाशिंगटन डीसी पर 6 जनवरी 2021 को ट्रम्प के उकसावे पर भीड़ ने हमला किया और इलेक्टोरल कोलेज वोट की गिनती को बाधित करने की कोशिश की थी, ताकि विजयी प्रत्याशी जो बाइडेन के राष्ट्रपति चुनाव को अन्तिम रूप न देकर ट्रम्प को ही राष्ट्रपति रहने दिया जाये। यह हमला असफल रहा, लेकिन इस दौरान 174 पुलिसकर्मी सहित कई लोग घायल हुए और 5 लोग मारे गये। द्वितीय संसदीय समिति का मानना था कि यह हमला ट्रम्प द्वारा चुनाव को पलटने की मुहिम का हिस्सा था। इस घटना के बाद ट्रम्प के विरोधियों ने उन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।

* एक गोरे पुलिसकर्मी द्वारा काले अमरीकी नागरिक जार्ज फ्लॉयड की हत्या के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान ट्रम्प ने अपने जनरल मार्क मिली से पूछा था कि क्या आप इन्हें गोली नहीं मार सकते, उनके पैरों में ही गोली मार दें। मार्क मिली ने इस पर ट्रम्प को अपना इस्तिफा लिखा, जिसमें उन्होंने बताया था कि दूसरे विश्व युद्ध में हम फासीवाद के खिलाफ लड़े, नाजीवाद के खिलाफ लड़े, आप उन्हीं सिद्धान्तों को मानते हैं जिनके खिलाफ हम लड़े। हालाँकि मिली ने इस्तिफा नहीं दिया और पद पर बने रहे।

* अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रम्प ने एक फासीवाद विरोधी लोकतांत्रिक संगठन एण्टिफा को आतंकवादी संगठन घोषित करने का प्रयास किया। ट्रम्प ने कहा था कि “भीतरी दुश्मनों” से निपटने के लिए वे अमरीकी धरती पर सेना तैनात करेंगे। 2016 के बाद से ही उनके राजनीतिक बयान “हम” बनाम “वे” पर आधारित रहे हैं जिसमें अपने समर्थकों को असली अमरीकी और विरोधियों–– मुस्लिम, आप्रवासी, वामपंथी और बुद्धिजीवियों को दुश्मन के रूप में परिभाषित करते रहे। ट्रम्प ने कई बार राजनीतिक असहमति और आलोचना को गैर कानूनी घोषित करने का समर्थन किया। अमरीकी सुरक्षा अधिकारी जनरल मार्क मिली, जो ट्रम्प के आदेशों को आँख मूँद कर मानने के लिए तैयार नहीं थे, ट्रम्प ने कहा कि मिली को देशद्रोह के लिए मार देना चाहिए। रिपब्लिकन प्रतिनिधि पॉल गोसर ने कहा कि समलैंगिकता के समर्थक जनरल मिली को फाँसी दी जायेगी। सेवानिवृत जनरल बैरी मैथक्रेले ने कहा कि ट्रम्प के बयान 1930 के दशक के नाजी बयान से मिलते–जुलते हैं।

* समाचार एजेन्सी एपीआर के एक विश्लेषण के अनुसार 2022–2024 के बीच ट्रम्प ने कथित विरोधियों की जाँच करने, उन पर मुकदमा चलाने, कैद करने और सजा देने की 100 से अधिक धमकियाँ दीं।

* आप्रवासियों, खासकर मैक्सिको से आये मजदूरों के खिलाफ ट्रम्प ने न केवल चुनाव अभियान में जहर उगला, बल्कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए बिना कागजात आप्रवासियों के पैर में गोली मारने का आह्वान किया था। रैलियों में ट्रम्प ने कहा था कि बिना कागज के आप्रवासी “अमरीकी नागरिकों का बलात्कार करेंगे, लूटपाट करेंगे, चोरी करेंगे, लूटेंगे और मारेंगे। ये राक्षस, घिनौने जानवर, जंगली और शिकारी हैं जो आपके रसोई घर में जायेंगे और आपका गला काट देंगे।” 2018 में ट्रम्प ने “जीरो टॉलरेन्स” नीति की शुरुआत की जिसके तहत जिन आप्रवासियों पर आव्रजन कानून के उलंघन आरोप हो उनके लिए सजा का प्रावधान किया गया। अमरीका–मैक्सिको सीमा पर पहुँचने वाले बच्चे और माता–पिता को जबरन अलग कर दिया गया, माता–पिता को गिरफ्तार किया गया जबकि बच्चों को उनसे अलग हिरासत में डाल दिया गया। 2018 तक ऐसे बच्चों की संख्या 15,000 तक पहुँच गयी थी। वन लोंग नाइट: ए गलोबल मिस्ट्री ऑफ कंसन्ट्रेशन कैम्प के लेखक ऐंड्रिया पित्जर ने माना कि इन शिविरों की हालत नाजी कंसेन्ट्रेशन कैम्प जैसी थी, जहाँ मौत की कई घटनाएँ भी सामने आयी थीं।

* ट्रम्प ने अपने 2024 के चुनाव अभियान में भी नजरबन्दी शिविर बनाने का वादा किया जिसमें बिना कोई उचित प्रक्रिया अपनाये लाखों लोगों को वहाँ रखने की योजना है जिनमें उनके राजनीतिक विरोधी और आलोचक भी हो सकते हैं।

* ट्रम्प को चुनाव में घोषित नाजियों और फासीवादियों का समर्थन प्राप्त था। 2016 में नेशनल सोशलिस्ट मूवमेन्ट और कू क्लक्स क्लान (केकेके) ने ट्रम्प का समर्थन किया तथा मतदान केन्द्रों की निगरानी और मतदाताओं को डराने–धमकाने का काम किया। ट्रम्प को केकेके के डेविड ड्यूक, ऑल्ट–राइट कार्यकर्ता स्पैंसर और नाजी कार्यकर्ता एंड्रयू एंग्लिन जैसों का खुला समर्थन था। उनका उद्घाटन भाषण ऑल्ट–राइट के स्टीफन मिलर और स्टीव बैन ने लिखा था।

* ट्रम्प को फासीवादी अर्धसैनिक समूहों–– ओथ कीपर्स, प्राउड ब्बायज और थ्री प्रसेंटर्स द्वारा समर्थन और सुरक्षा की पेशकश की गयी थी जो हिटलर और मुसोलिनी द्वारा इस्तेमाल किये गये नागरिक मिलिशिया के समरूप था। इन संगठनों ने एण्टीफा और ब्लैक लाइव्स मैटर आन्दोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सड़क पर लड़ाई लड़ी थी। 2016 के चुनाव में ट्रम्प समर्थकों की बर्नी सैंडर्स और हिलेरी क्लिंटन समर्थकों के साथ कई बार हिंसक झड़पें हुर्इं।

* 2024 में ट्रम्प की जीत का जश्न मनाते हुए कई फासीवादियों ने बयान दिये जिनमें देश भर में गोरों की ताकत को फैलाने, महिलाओं की रसोई घर में वापसी, गर्भपात को गैर कानूनी बनाने, समलैंगिकों का दमन, अन्तर्जातीय विवाह पर रोक, स्कूली शिक्षा में इसाइयत पढ़ाने, न्यू यार्क में फिर से गोरों का वर्चस्व कायम करने, मियामी को खाली कराने जैसी घोर प्रतिक्रियावादी मनसूबों की भरमार थी। खुद ट्रम्प भी अक्सर हिटलर और मुसोलिनी के उद्धारण दोहराते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं।

* पत्रकार पैट्रिक कॉकबर्न, राजनीतिक सिद्धान्तकार विलियम इ कोनोली, नागरिक अधिकार वकील वर्ट न्यूबौर्न, ट्रम्प के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जॉन एफ केली, प्रोफेसर रॉबर्ट रीच और कैनैल बेस्ट सहित अनेक विद्वानों और विशेषज्ञों ने ट्रम्प को फासीवादी माना है। इनका मानना है कि ट्रम्प का नजरिया नाजियों की तरह ही विरोधियों, अल्पसंख्यकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनना, उनके बारे में झूठ बोलना, व्यक्तिगत अपमान करना, धमकियाँ देना, आप्रवासियों और अन्य विदेशियों के प्रति नफरत फैलाना, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताना, धार्मिक कट्टरता, गोरा नस्लवाद, आर्थिक असुरक्षा का भयदोहन और नकली दुश्मन की तलाश करना शामिल है। ट्रम्प के सन्दर्भ में ऐसे उद्धारणों की कमी नहीं है, उन पर लेख, रिपोर्ट और किताबों की भरमार है।

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ट्रम्प के पहली बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमरीकी राजनीतिक विशेषज्ञों और टीकाकारों ने कई किताबें लिखी थी जिनमें एक महत्वपूर्ण किताब है–– ट्रम्प इन द व्हाइट हाउस: ट्रेजेडी एण्ड फार्स। इसके लेखक जॉन बेलामी फोस्टर ने ट्रम्प की जीत को नवउदारवादी नीतियों की असफलता और उससे निपटने के लिए नवफासीवादी राजनीति के उभार के बीच के सम्बन्ध को तथ्यपूर्ण और तार्किक रूप से प्रस्तुत किया है। नवउदारवादी नीतियों के चलते बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और गरीबी से त्रस्त, बहुसंख्यक गोरी आबादी को ट्रम्प ने लोकलुभावन जुमलों और फासीवादी नारों के सहारे अपनी ओर आकर्षित किया और जनता के आक्रोश को मुट्ठीभर अमीरों की निर्बाध लूट–खसोट की दिशा से मोड़ कर मैक्सिको से आये आप्रवासी मजदूरों, काले अमरीकियों और मुसलमानों की ओर मोड़ दिया। उन्हें इस बात का कायल बना दिया कि उनकी बर्बादी के लिए जनविरोधी नवउदारवादी नीतियाँ नहीं, बल्कि उन्हीं की तरह मेहनत करके जिन्दगी गुजारने वाले दूसरे धर्मों, नस्लों और राष्ट्रीयताओं के लोग हैं। “बाँटो और राज करो” की यह नीति हिटलर और मुसोलिनी ने भी अपनायी थी और अपने देश में पूँजीवादी संकट से निजात पाने के लिए नस्लवादी घृणा का सहारा लिया था। उसके सौ साल बाद आज नवउदारवादी नीतियों की असफलता से उत्पन्न असाध्य आर्थिक संकट से निपटने के लिए अमरीका सहित दुनिया के तमाम देशों में फासीवाद फिर से सिर उठा रहा है।

एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था और नवउदारवाद का हमला

यहाँ एक बार ठहर कर नवउदारवादी नीतियों के लागू होने की विश्वव्यापी परिघटना और ऐतिहासिक परिस्थितियों पर नजर डाल लेना जरूरी है। दरअसल, 1990 के आसपास सोवियत रूस के विघटन और बर्लिन की दीवार गिरने के बाद पूरी दुनिया के शक्ति सन्तुलन में गुणात्मक बदलाव आया था। दुनिया की एक महाशक्ति के रूप में रूसी खेमे के बिखराव ने एक ध्रुवीय विश्व का आधार तैयार किया। नवस्वाधीन देशों को रूसी खेमे से अपने आर्थिक स्वायत्तता कायम रखने की जो ताकत मिलती थी, दोनों महाशक्तियों के बीच उनकी सौदेबाजी की जो गुंजाइश होती थी, उसके चलते वे काफी हद तक पश्चिमी साम्राज्यवादी पूँजी के दबाव से मुक्त रह पाये थे और अपनी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रयासरत थे। 1990 के बाद एक ध्रुवीय विश्व बनने के चलते उन्होंने अमरीकी खेमे के आगे समर्पण कर दिया। अमरीकी चैधराहट वाले साम्राज्यवादी खेमे को अपनी मनोवांछित विश्व आर्थिक व्यवस्था (नवउदारवादी नीतियाँ) पूरी दुनिया पर थोपने का मौका मिल गया। उसे पूर्व समाजवादी देशों और नवस्वाधीन देशों में पूँजी निवेश के लिए नये–नये देश, कच्चे माल के अपार स्रोत, बेहद सस्ता श्रम और बाजार का विस्तृत इलाका हाथ लग गया। इन देशों पर विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के अनुरूप ढाँचागत समायोजन थोपा गया। उन्हें अपनी पहले की नीतियाँ बदलने को मजबूर किया गया, जिनमें प्रमुख बदलाव थे–– पूँजी की निर्बाध आवाजाही, आयात–निर्यात रुकावटों को हटाना, डॉलर के प्रभुत्व को उन देशों की मुद्राओं के ऊपर थोपना, स्वायत्त आर्थिक नीतियों को बदलवाना इत्यादि। डंकल प्रस्ताव के जरिये गैट समझोते को संस्थागत और बाध्यकारी बनाने के लिए विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की गयी जिसमें उद्योग और सेवा क्षेत्र के अलावा कृषि व्यापार और ज्ञान आधारित व्यापार को शामिल किया गया। उदारीकरण के नाम पर विदेशी पूँजी के प्रति उदारता, निजीकरण के नाम पर अपने सार्वजनिक क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों को कोड़ियों के मोल देशी–विदेशी पूँजीपतियों के हवाले करना और वैश्वीकरण के नाम पर पूँजी के रास्ते की सभी रुकावटों को दूर करना नवउदारवादी नीतियों के केन्द्रीय तत्व थे। उल्लेखनीय है कि पूँजी का वैश्वीकरण तो हुआ, लेकिन देशों की सरहदों के आर–पार श्रम–शक्ति की आवाजाही पर रुकावटें और ज्यादा बढ़ा दी गयीं।

नवउदारवाद ने साम्राज्यवादी पूँजी की बेलगाम लूट को दुनिया भर में फैला दिया। जिन–जिन देशों में ये नीतियाँ लागू हुर्इं वहाँ तबाही मची, लेकिन इसने विश्व पूँजीवाद के संकट को हल करने के बजाये उसे टालकर और गहरा किया। पूँजी संचय और पूँजी निवेश का निरन्तर संकट बढ़ता ही गया। कारण यह है कि मुक्त व्यापार के दौर में पूँजीवादी व्यवस्था में आर्थिक विकास के साथ बीच–बीच में मन्दी का आना एक सामान्य स्थिति थी, आज साम्राज्यवाद की चरम पतनशील अवस्था में, जहाँ मुट्ठी भर दैत्याकार एकाधिकारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और वित्तीय सट्टेबाजों का वर्चस्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, पूँजीवादी अर्थव्यवस्था असाध्य संकट का शिकार है जिसमें लगातार आर्थिक विकास सामान्य नियम नहीं, बल्कि अपवाद है। इस संकट का हल इस व्यवस्था में नहीं है। यह संकट अब मन्दी से आगे जाकर ठहराव का संकट बन गया है। अमरीका ही नहीं बल्कि जी–7 के अन्य देशों का भी यही हाल है जिनकी वृद्धि दर 2016 में औसतन 1–3 प्रतिशत थी। उल्लेखनीय है कि 1929 से 1949 तक, महामन्दी के दौर में अमरीकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 1–3 प्रतिशत ही थी।

अमरीका, जापान और यूरोप धीमी विकास दर, बढ़ती बेरोजगारी और वित्तीय अस्थिरता के शिकार हैं, जिसका पूरी दुनिया पर घातक प्रभाव पड़ रहा है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में (खासकर चीन में) स्थिति कुछ बेहतर है लेकिन उनका विकास भी चिरस्थाई नहीं क्योंकि वैश्विक दुनिया के झटकों से वे अप्रभावित नहीं रहेंगे।

पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में जो वृद्धि हो रही है वह दौलत भी मुट्ठी भर धनाढ्यों के पास जा रही है। आय की असमानता अपने चरम पर है। गरीबी–अमीरी की खाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। अमरीका में 10 प्रतिशत ऊपरी आबादी के पास 70 प्रतिशत से अधिक सम्पत्ति है जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी का हिस्सा लगभग शून्य के बराबर है। दुनिया के 6 सबसे अमीर अरबपति जिनमें 4 अमरीकी हैं, उनके पास दुनिया के निचली 50 प्रतिशत आबादी से अधिक सम्पत्ति है। पूरी दुनिया पर वित्तीय अल्पतंत्र के प्रभुत्व वाली सरकारें राज कर रही हैं। ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में जिन 17 लोगों को अपने मंत्रीमण्डल के लिए छाँटा था उनकी कुल सम्पत्ति जिसमें ट्रम्प की सम्पत्ति शामिल नहीं थी देश की एक तिहाई आबादी की कुल सम्पत्ति से अधिक थी। दुनिया के दूसरे देशों में भी वित्तीय अल्पतंत्र और याराना पूँजीवाद का यही हाल है। पूँजीवादी व्यवस्था के लिए यह एक खतरनाक संकेत है, यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घण्टी है।

अमरीका में नवउदारवादी नीतियों की असफलता का चरम रूप 2007–09 में हाउसिंग बुलबुले का फटना था जिसने वित्तीय महासंकट को जन्म दिया। इसने अमरीकी साम्राज्यवाद और उसकी चैधराहट वाली पूरी विश्व पूँजीवादी व्यवस्था को ऐसे दीर्घकालिक संकट के दलदल में धकेल दिया जिससे वह आज तक निकल नहीं पायी है।

इस वित्तीय महासंकट को हल करने के नाम पर उन्हीं नीतियों को और कड़ाई से लागू किया गया। मुट्ठी भर धनिकतंत्र के हित में बहुसंख्यक आबादी का निर्मम शोषण, भारी संख्या में लोगों को नौकरी से निकालना, स्थायी नौकरी खत्म करना, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित तमाम सरकारी सेवाओं का निजीकरण करके उन्हें जनता की पहुँच से दूर करना, इन जनविरोधी नीतियों को पहले से कहीं ज्यादा कड़ाई से लागू किया गया।

नवउदारवाद की असफलता और नवफासीवाद का उभार

नवउदारवादी बुलबुला फटने के साथ ही यह सच्चाई सामने आ गयी कि इन नीतियों से न तो पूँजीवादी आर्थिक संकट हल हुआ, न ही लोगों की जिन्दगी में खुशहाली आयी। जनता के बढ़ते असंतोष और आक्रोश को दबाने के लिए और राजनीतिक व्यवस्था को चलाने में लोकतंत्र अब कारगर नहीं रह गया। ऐसे में दुनिया भर में फासीवादी ताकतों और देशी–विदेशी पूँजी का नया गठजोड़ शुरू हुआ। पिछले सौ वर्षों से जो फासीवादी ताकतें हासिये पर पड़ी हुई थीं, संकटग्रस्त इजारेदार पूँजीपतियों की शह पाकर एक राजनीतिक शक्ति के रूप में दुबारा मैदान में उतर आयीं। पूँजीपतियों के मालिकाने में चलने वाली मीडिया ने उनके पक्ष में माहौल बनाया। अमरीका में ट्रम्प, भारत में मोदी से लेकर फ्रांस, इटली, नीदरलैण्ड, स्वीडन, ब्राजील और तुर्की तक, हर जगह फासीवाद का नया उभार दिख रहा है।

दरअसल, मौजूदा लोकतंत्र पूँजीवादी व्यवस्था को चलाने वाली एकमात्र और अनिवार्य प्रणाली नहीं है। संकट की घड़ी में जब पूँजी के अस्तित्व पर खतरा मण्डराता है तो शासक वर्ग फासीवाद का सहारा लेता हैै। 1930 के दशक की मन्दी और वर्तमान दौर का विश्वव्यापी आर्थिक ठहराव ऐसी ही विकट परीस्थिति है। वैसे भी, साम्राज्यवादी एकाधिकारी पूँजी वर्चस्ववादी होती है, उसे लोकतंत्र की नहीं तानाशाही की जरूरत होती है। मेहनतकश जनता के लिए उनकी झोली में कुछ भी साकारात्मक नहीं रह जाता। चरम राष्ट्रवाद, नस्लवाद, साम्प्रदायिक विद्वेष, विदेशियों के प्रति घृणा और विरोधियों का दमन–उत्पीड़न उनके अस्तित्व की शर्त बन जाती है। इसलिए आज दुनिया के विभिन्न देशों में नवफासीवाद का जो उभार देखने को मिल रहा है वह कोई राजनीतिक भटकाव या विसंगति नहीं, बल्कि संकटग्रस्त पूँजीवादी देशों के शासक वर्ग द्वारा दो प्रमुख शासन प्रणालियों लोकतंत्र और फासीवाद में से सचेतन तौर पर अपनायी गयी वैकल्पिक प्रणाली है। हिटलर और मुुसोलिनी ने भी एकाधिकारी पूँजी और सम्पत्ति की व्यवस्था की जमकर हिफाजत की थी और उनको बढ़ावा दिया था।

नवफासीवाद की कार्यशैली हर जगह पुराने फासीवादियों से मूलत: मिलती–जुलती है। नवउदारवादी नीतियों को कड़ाई से लागू करना इनकी सर्वोपरी जिम्मेदारी है। इसके साथ ही, अपने विरोधियों पर हमला करना, राष्ट्रविरोधी बताकर उन्हें बिना मुकदमा चलाये जेल में डाल देना, मीडिया और सोशल मीडिया पर अपने विरोधियों के खिलाफ कुत्सा प्रचार करना, सड़क पर अपने गुण्डा गिरोह द्वारा हमला करवाना, न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपने हाथ का खिलौना बनाना, विरोधी पार्टियों को धमकाना, उन पर फर्जी मुकदमे दर्ज करना, खरीद–फरोख्त करना, मजदूर वर्ग की लम्बी लड़ाई से हासिल अधिकारों को छीनना, किसानों और अन्य मेहनतकशों को बदहाली का शिकार बनाना, जनगण पर भारी टैक्स लगाना और पूँजीपतियों के लिए जनता के निर्मम शोषण की जमीन तैयार करना आज के नवफासीवादी शासकों की कमोबेश आम रणनीति है।

लेकिन आज का फासीवाद पिछली सदी के पूर्वार्ध के क्लासिकीय फासीवाद से कई मामलों में अलग भी है। उस दौर में राष्ट्र आधारित एकाधिकारी पूँजी का वर्चस्व था जबकि आज वैश्विक एकाधिकारी पूँजी का वर्चस्व है। जर्मनी का फासीवाद पूरी दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए उपनिवेशों के बटवारे और पुर्नबटवारे के लिए युद्धोन्माद फैला रहा था ताकि उन देशों में पूँजी निवेश करके अतिलाभ कमा सके। इसके विपरीत आज दुनिया भर में पूँजी का वर्चस्व कायम है और पूँजी निवेश के लिए दुनिया में कहीं कोई राजनीतिक रुकावट नहीं है। साम्राज्यवादी देशों के बीच टकराव की जगह मेलजोल का सम्बन्ध है। लेकिन पहले की तरह ही आज का फासीवाद भी पूँजीवादी संकट की पैदाइश है। चूँकि वैश्वीकरण ने पूँजी के संकट को हल नहीं किया, बल्कि उसे चिरस्थायी बना दिया, इसलिए अपनी व्यवस्था को जनाक्रोश से बचाने के लिए फासीवादी रास्ता अपनाना तमाम देशों के शासकों की नियति बन गयी है।

एक बात और, हिटलर–मुसोलिनी ने अपने देश में बेरोजगारी दूर करके वहाँ की युवा पीढ़ी को आकर्षित किया था। लेकिन आज के नवफासीवादी शासक बेरोजगारी और गरीबी दूर नहीं कर सकते क्योंकि नवउदारवादी नीतियों के रहते वे न तो पूँजीपतियों पर टैक्स लगा सकते हैं और न ही बजट घाटा बढ़ा सकते हैं। उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे दुबारा समाज कल्याण की योजनाएँ लागू करेंगे, अमीर–गरीब की खाई कम करेंगे, कार्पोरेट के खिलाफ जाकर किसानों–मजदूरों के हित में नीतियाँ बनायेंगे या जनता के जीवन निर्वाह खर्च को कम करके उसे राहत पहुँचायेंगे। फासीवाद अपनाने के पीछे उनका एक ही मकसद है, जनता का बेरहमी से शोषण, दमन और उत्पीड़न। इसका अनिवार्य नतीजा जनाक्रोश का लगातार उग्रतर होते जाना है।

नवउदारवादी नीतियों का दुष्प्रभाव सिर्फ अर्थव्यवस्थाओं की तबाही, जनता की बदहाली तक सीमित नहीं, बल्कि यह व्यवस्था पूरी धरती को तबाह करने पर आमादा है। पेरिस समझौते से ट्रम्प का बाहर जाना, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को नकारना इसकी एक ताजा मिसाल है।

1990 के बाद से अब तक दुनिया भर में जो भी पार्टी आयी सबने उन्हीं नीतियों को लागू किया और आगे भी वही करेंगी। अपनी और दुनिया की तबाही की कीमत पर भी वे यही करेंगी। हमें ट्रम्प हटाओ–मोदी हटाओ से आगे जाकर इस सड़ी–गली व्यवस्था में आमूल बदलाव की दिशा में सोचना और काम करना होगा।

सवाल यह है कि इस नवफासीवाद का विकल्प क्या है। जैसा कि हम जानते हैं, फासीवाद या लोकतंत्र महज शासन चलाने की प्रणाली है जबकि सारी समस्याओं की जड़ में चरम लूट और शोषण पर आधारित मौजूदा आर्थिक व्यवस्था है और उसमें बदलाव लाकर ही समस्याओं से निजात मिल सकती है। पूँजीवाद जिस मरणासन्न स्थिति में पहुँच कर नवउदारवादी आर्थिक नीति और नवफासीवादी राजनीति का सहारा ले रहा है, उसका विकल्प एक समता मूलक, न्यायपूर्ण और जनपक्षधर व्यवस्था, समाजवादी व्यवस्था ही हो सकती है। वित्तीय अल्पतंत्र की जगह बहुसंख्य जनगण का शासन।

दूसरे विश्व युद्ध में फासीवाद की अनिवार्य शिकस्त के बाद दुनिया में एक नयी लहर आयी थी–– राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवादी क्रान्ति की। फासीवाद फिर आया है–– इसका अन्त भी निश्चित है और साथ ही न्यायपूर्ण समाजवादी विश्व व्यवस्था का आना भी तय है।